BIS

Explore

Search

Wednesday, July 8, 2026, 4:29 pm

Wednesday, July 8, 2026, 4:29 pm

डिजिटल दौर में महाराष्ट्र की राजनीति की पुरानी सोच

डिजिटल दौर में महाराष्ट्र की राजनीति की पुरानी सोच
Share This Post

एक ओर भारत तेजी से डिजिटल युग की ओर बढ़ रहा है, और दूसरी ओर महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य के नेता अब भी कैमरे के सामने अनजाने में अपना राजनीतिक करियर दांव पर लगा रहे हैं। हाल की घटनाओं से साफ है कि राज्य के कई जनप्रतिनिधि सोशल मीडिया की ताकत और “ऑप्टिक्स” यानी दृश्य प्रभाव की गंभीरता को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं।

🎥 कैमरे की नज़र से बिगड़ती छवि

बीते कुछ महीनों में महाराष्ट्र के कई राजनेता ऐसे कृत्यों में लिप्त पाए गए जो कैमरे में कैद होकर वायरल हो गए — विधानसभा में वीडियो गेम खेलना, मारपीट, धन का प्रदर्शन, और भाषा के नाम पर हिंसा। इन घटनाओं ने न केवल जनता का विश्वास डगमगाया है, बल्कि राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में राज्य की राजनीति को शर्मिंदा भी किया।

CG

📱 सोशल मीडिया: हथियार या आफत?

राजनीतिक संचार में सोशल मीडिया एक शक्तिशाली हथियार है, पर यदि इसका इस्तेमाल समझदारी से न किया जाए तो यह आफत बन सकता है। आज जनता नेताओं को केवल भाषणों से नहीं, बल्कि उनके व्यवहार, बॉडी लैंग्वेज और सोशल मीडिया पर मौजूदगी से भी आंकती है। कैमरे से बचा कुछ नहीं रह जाता।

🔍 क्या अंदर ही अंदर चल रही है रणनीतिक बदनामी?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि कुछ वायरल वीडियो विपक्षी नहीं, बल्कि सत्ताधारी गठबंधन के भीतर से ही सामने आ रहे हैं। सीट बंटवारे की होड़ और आंतरिक प्रतिस्पर्धा में नेता एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए अब डिजिटल हथियारों का सहारा ले रहे हैं। इससे राजनीति और जनता के बीच की दूरी और भी बढ़ रही है।

🛑 समय है आत्ममंथन का

आज जब एक आम नागरिक भी जानता है कि कैमरे के सामने क्या करना है और क्या नहीं, तब एक मंत्री या विधायक का बार-बार ऐसे विवादों में आना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। यह स्पष्ट संकेत है कि नेताओं को मीडिया प्रशिक्षण, सार्वजनिक व्यवहार, और डिजिटल जिम्मेदारी के विषय में प्रशिक्षण की सख्त ज़रूरत है।

📣 निष्कर्ष

महाराष्ट्र भारत का औद्योगिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा है, लेकिन राजनीतिक शिष्टाचार और डिजिटल साक्षरता के क्षेत्र में यह पिछड़ता दिख रहा है। यदि समय रहते राजनीतिक दलों ने अपने नेताओं को प्रशिक्षित नहीं किया, तो न केवल उनकी छवि गिरेगी, बल्कि राज्य की लोकतांत्रिक गरिमा भी कमजोर पड़ेगी।

 


Share This Post

Leave a Comment