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Wednesday, February 18, 2026, 1:36 am

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बस्तर की नई सुबह: बंदूकों के साए से विकास की राह तक

बस्तर की नई सुबह: बंदूकों के साए से विकास की राह तक
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कभी बस्तर का नाम आते ही आंखों के सामने घने जंगलों में लाल झंडे लहराते, गोलियों की आवाज़ और डर से सिहरता माहौल उभर आता था। यह इलाका वर्षों तक वामपंथी उग्रवाद का गढ़ रहा, जहां सरकार की मौजूदगी एक कल्पना जैसी थी और आम लोगों के लिए राज्य सिर्फ एक दूर की परछाईं।

लेकिन पिछले डेढ़ साल में यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में और सुरक्षा बलों की संगठित रणनीति के चलते माओवाद अब लगातार पीछे हट रहा है। आंकड़े खुद गवाही देते हैं—435 उग्रवादी मुठभेड़ों में ढेर, 1,432 ने आत्मसमर्पण किया और 1,457 गिरफ्तार हुए। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब माओवादी महासचिव और विचारधारा के मुख्य सूत्रधार बसवराजु मारा गया।

CG

लोहे की मुट्ठी और मदद का हाथ
बीजापुर के कर्रेगुड़ा में 31 उग्रवादियों के मारे जाने की घटना ने मोड़ तो दिया ही, लेकिन सरकार ने सिर्फ सख्ती पर भरोसा नहीं किया। राज्य की पुनर्वास योजना, जो देश में सबसे व्यापक मानी जा रही है, आत्मसमर्पण करने वालों को मासिक भत्ता, प्रशिक्षण, ज़मीन, व्यवसाय शुरू करने के लिए पूंजी और नई जिंदगी का अवसर देती है। लक्ष्य साफ है—मार्च 2026 तक बस्तर को नक्सल-मुक्त बनाना।

जहां कभी तिरंगा नहीं पहुंचा, वहां अब स्कूल खुल रहे
बदलाव सिर्फ हिंसा घटने तक सीमित नहीं है। अबुजमाड़ के रेकावाया जैसे इलाकों में, जहां कभी माओवादी अपनी पाठशालाएं चलाते थे, अब सरकारी स्कूलों में तिरंगा फहरता है। वर्षों से बंद स्कूल फिर से शुरू हुए हैं। पुर्वर्ती, जो माओवादी कमांडर हिड़मा का गांव है, वहां पहली बार बिजली पहुंची। बीजापुर के चिलकापल्ली में 77 साल बाद गणतंत्र दिवस पर पहली बिजली की बल्ब जली।

सड़कें, पुल और मोबाइल टावर—जुड़ते गांव
275 किलोमीटर मुख्य सड़कों का निर्माण, 49 संपर्क मार्ग, 11 नए पुल, केशकाल घाट चौड़ीकरण, इंद्रावती पर नया पुल और 140 किलोमीटर लंबी रावघाट–जगदलपुर रेल लाइन की मंजूरी—ये सब बस्तर को देश के साथ जोड़ने की तैयारी है। 607 मोबाइल टावर, जिनमें से 349 पर 4G सुविधा, डिजिटल जुड़ाव को हकीकत बना रहे हैं।

“आपका अच्छा गांव”—सुरक्षा कैंप से सेवाओं तक
‘नियाड नेल्ला नार’ योजना के तहत सुरक्षा कैंपों के आसपास के गांवों में राशन कार्ड, आधार पंजीकरण, आयुष्मान कार्ड, किसान क्रेडिट कार्ड, उज्ज्वला गैस कनेक्शन जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं। पंचायत चुनाव, झंडारोहण और सांस्कृतिक कार्यक्रम अब वहां भी हो रहे हैं, जहां पहले सरकार कदम नहीं रख सकती थी।

इंद्रावती से समृद्धि की धार
₹50,000 करोड़ का बोधघाट सिंचाई व जलविद्युत प्रोजेक्ट 8 लाख हेक्टेयर भूमि को सींचने और 200 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखता है। इंद्रावती और महानदी को जोड़ने की योजना इस इलाके को जल–सुरक्षित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

रोज़गार और आजीविका में नई रफ्तार
‘हरे सोने’ कहे जाने वाले तेंदू पत्ते की कीमत 4,000 से बढ़ाकर ₹5,500 प्रति बोरा कर दी गई है, जिससे 13 लाख संग्राहकों को सीधा लाभ हो रहा है। चरन पदुका योजना फिर शुरू हुई है, जिससे जंगल में काम करने वाले श्रमिकों को सुरक्षा जूते मिलते हैं। 90,000 से अधिक युवाओं को प्रशिक्षण मिला, जिनमें से 39,000 को नौकरी भी मिली। 2024–30 की औद्योगिक नीति में पुनर्वासित पूर्व नक्सलियों को नौकरी देने वाले उद्योगों के लिए विशेष प्रोत्साहन शामिल है।

संस्कृति और खेल से लौटती पहचान
जहां पहले गोलियों की गूंज थी, वहां अब खेलों और गीतों की धुन सुनाई देती है। बस्तर ओलंपिक में 1.65 लाख प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। बस्तर पंडुम महोत्सव में 47,000 कलाकारों ने आदिवासी संस्कृति को मंच दिया। बैगा, गुनिया, सिरहा जैसे परंपरागत वैद्य अब वार्षिक मानदेय पा रहे हैं, जिससे सांस्कृतिक गौरव को सम्मान मिल रहा है।

सुरक्षा में स्थानीय हाथ
‘बस्तर फाइटर्स’ बल में 3,202 पद सृजित हुए हैं, जिससे युवाओं को रोज़गार और इलाके की सुरक्षा दोनों सुनिश्चित हो रही है। एनआईए और एसआईए लगातार माओवादियों की सप्लाई और फंडिंग नेटवर्क को तोड़ रहे हैं।

निस्संदेह, दशकों की उपेक्षा का इलाज एक दिन में नहीं होगा और उग्रवाद पूरी तरह खत्म हुआ कहना जल्दबाज़ी होगी। लेकिन फर्क इतना बड़ा है कि अब बस्तर में राज्य केवल नाम भर नहीं, बल्कि स्कूल, सड़क, बिजली और सम्मान देने वाली एक सजीव हकीकत बन चुका है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के शब्दों में—

“बस्तर में अब बंदूक की आवाज़ की जगह किताबों की सरसराहट, सड़कों पर चलती गाड़ियों की रफ्तार और उम्मीद की बातें सुनाई देती हैं।”

यह बदलाव अगर बरकरार रहा, तो बस्तर की अगली पीढ़ी के लिए यह केवल शांति का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और अवसरों से भरे भविष्य का वादा होगा।


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