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Friday, March 13, 2026, 4:09 am

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चौथे पायदान पर भारत: क्या अब आम आदमी की बारी है?

चौथे पायदान पर भारत
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भारत ने अब आधिकारिक रूप से जापान को पीछे छोड़ते हुए विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का गौरव प्राप्त कर लिया है। NITI आयोग की 10वीं गवर्निंग काउंसिल की बैठक में यह घोषणा न केवल आंकड़ों की एक उपलब्धि थी, बल्कि एक प्रतीकात्मक क्षण भी—जिसने भारत के वैश्विक उभार की पुष्टि की।

पिछले एक दशक में भारत ने 10वें स्थान से चौथे स्थान तक का सफ़र तय किया है। महामारी, वैश्विक मंदी, युद्ध और तेल संकट जैसी बाधाओं के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था का $4 ट्रिलियन तक पहुँचना वास्तव में प्रशंसनीय है। यह तेज़ी का श्रेय जाता है देश के मजबूत घरेलू उपभोग, तकनीकी क्रांति, सेवा क्षेत्र की ऊर्जा और निर्माण उद्योग के विकास को।

CG

लेकिन सवाल यह है—क्या इस सफलता का लाभ आम नागरिक तक पहुँचा है?

आज जबकि भारत ग्लोबल रैंकिंग में ऊपर जा रहा है, उसी समय प्रति व्यक्ति आय (Per Capita GDP) के मामले में वह 141वें स्थान पर है—बांग्लादेश से भी पीछे। इसका अर्थ है कि भारत की कुल दौलत तो बढ़ रही है, लेकिन उसकी समान बँटवारे की तस्वीर भयावह है। कुछ गिने-चुने कॉर्पोरेट घराने और Individuals के हाथों में अधिकांश संपत्ति सिमटी हुई है, जबकि करोड़ों लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं।

यह आर्थिक असमानता लोकतंत्र और सामाजिक न्याय दोनों के लिए खतरा है।

सच यह है कि चौथा स्थान हमें केवल GDP की दृष्टि से मिला है, जीवन स्तर की दृष्टि से नहीं। जापान को पीछे छोड़ना केवल इसलिए संभव हुआ क्योंकि वह एक वृद्ध समाज है, जहाँ जनसंख्या और उत्पादन दोनों में ठहराव आ चुका है। भारत के पास युवा शक्ति है—एक जनसांख्यिकीय लाभांश—लेकिन क्या हम उसे नीति और नियोजन से साकार कर पा रहे हैं?

देश को अब सिर्फ निवेश, निर्माण और नवाचार पर ही नहीं, बल्कि न्याय, समानता और सशक्तिकरण पर भी ज़ोर देना होगा। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा जैसे मोर्चों पर नीतिगत सुधार जरूरी हैं। अगर हमने इसे नज़रअंदाज़ किया, तो यह आर्थिक छलांग खोखली साबित हो सकती है।

भारत का चौथा स्थान कोई मंज़िल नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—कि अब आगे की दौड़ और भी कठिन होगी। जर्मनी को पीछे छोड़ तीसरे स्थान पर पहुँचना संभव है, लेकिन यह सफ़र तभी सार्थक होगा जब यह समावेशी हो—जहाँ हर भारतीय को गरिमा, अवसर और कल्याण का अनुभव हो।

असली जश्न तब होगा जब भारत की आर्थिक ताकत, हर भारतीय के जीवन की गुणवत्ता में परिलक्षित हो।

 


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