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Wednesday, February 11, 2026, 8:57 am

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आतंक पर मौन रहना अब विकल्प नहीं, वैश्विक व्यवस्था की अग्नि परीक्षा

FATF
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FATF के दरवाज़े पर भारत की दस्तक एक औपचारिकता नहीं — यह अंतरराष्ट्रीय नैतिकता की परीक्षा है

जब किसी देश की सीमा पर खून बहता है, और दुनिया उसे देखकर खामोश रहती है, तो यह केवल एक राष्ट्र की नहीं, पूरी वैश्विक व्यवस्था की असफलता होती है। भारत ने अब जिस प्रकार आतंकवाद के वित्तपोषण के विरुद्ध पाकिस्तान को FATF के समक्ष पुनः घसीटने का निर्णय लिया है, वह एक कूटनीतिक कदम नहीं, एक चेतावनी है — कि यदि अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो ‘नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था’ केवल एक मिथक रह जाएगी।

CG

पिछले वर्षों में पाकिस्तान ने बार-बार यह साबित किया है कि वह आतंकवाद को अपनी विदेश नीति का उपकरण मानता है। मसूद अजहर, हाफ़िज़ सईद, और साजिद मीर जैसे नाम केवल भारत की पीड़ा नहीं हैं — वे उस दोहरेपन की प्रतिमूर्ति हैं जिसमें आतंकी पलते हैं और दुनियाभर की सुरक्षा संस्थाएँ उन्हें नज़रअंदाज़ करती हैं।


आतंक की जड़ें सूखेंगी नहीं, जब तक उनके आर्थिक स्रोत काटे नहीं जाएंगे

आतंकवाद केवल बंदूक से नहीं चलता — उसे पालने के लिए पैसा, संरचना और राजनीतिक शह चाहिए। FATF का गठन इसी सोच के तहत हुआ था कि आतंक की फंडिंग पर वैश्विक शिकंजा कसा जाए। लेकिन क्या यह संस्था अब भी अपने उद्देश्यों पर टिकी है? यही असली प्रश्न है।

भारत ने FATF को जो नया डोज़ियर सौंपा है, वह महज तथ्यों की फेहरिस्त नहीं है। उसमें डिजिटल सबूत, GPS डेटा, और अंतर्राष्ट्रीय साइबर विशेषज्ञों द्वारा प्रमाणित सामग्री सम्मिलित है। यह आरोप नहीं — दस्तावेज़ी साक्ष्य हैं। और यदि फिर भी कार्रवाई न हो, तो यह FATF की निष्पक्षता पर ही प्रश्नचिन्ह लगाएगा।


अमेरिका की दोहरी नीति पर चुप्पी अब मुश्किल

FATF की राजनीति में अमेरिका का प्रभाव निर्णायक रहा है। लेकिन सवाल यह है — क्या अमेरिका आतंकवाद के मुद्दे पर अपने रणनीतिक हितों को ऊपर रखेगा? या फिर वह अपने ही द्वारा बनाए गए उस सिद्धांत को निभाएगा, जिसमें आतंकवाद के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस की बात की जाती है?

पाकिस्तान को FATF की ग्रे लिस्ट से बाहर निकालने में अमेरिका की चुप्पी पहले भी चर्चा में रही है। पर आज जब भारत का सबूत असंदिग्ध है, और पाकिस्तान की भूमिका वैश्विक मंचों पर उजागर हो चुकी है, तब यदि फिर कोई “रणनीतिक चुप्पी” अपनाई गई — तो दुनिया भर के लोकतंत्रों को इसका मूल्य चुकाना पड़ेगा।


पाकिस्तान: अस्थिरता का लाभार्थी बना रहना कब तक?

पाकिस्तान बार-बार एक “ना-नियंत्रण योग्य” राज्य के रूप में चित्रित होता है। उसकी आर्थिक बदहाली और अस्थिर शासन को कारण बनाकर उसे छूट दी जाती है। पर क्या यह सही है कि एक राष्ट्र की अस्थिरता उसे आतंकवाद की छूट का लाइसेंस बन जाए?

यदि FATF अब भी पाकिस्तान को कठघरे में नहीं खड़ा करता, तो यह केवल भारत ही नहीं — आतंक से जूझ रहे अफ्रीकी, यूरोपीय, और एशियाई देशों के लिए एक खतरनाक मिसाल होगी।


भारत की भूमिका: पीड़ित नहीं, नेतृत्वकर्ता

आज भारत केवल एक ‘आतंक का शिकार’ देश नहीं रहा — वह अब एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में वैश्विक आतंकवाद विरोधी ढांचे को नेतृत्व देने की स्थिति में है। भारत की विदेश नीति अब पीड़ित की अपील नहीं, उत्तरदायी वैश्विक नागरिक की चेतावनी है।

भारत का यह प्रयास इसलिए भी अहम है क्योंकि यह FATF जैसी संस्थाओं के भविष्य की विश्वसनीयता का सवाल बन गया है। यदि नियम, सबूत और सिद्धांतों की जगह राजनीतिक समीकरण हावी होते हैं, तो फिर किसी आतंकवादी को वित्तीय रोकने की उम्मीद बेमानी होगी।


🔴 निष्कर्ष: क्या FATF आतंक के खिलाफ खड़ा होगा, या फिर वह भी राजनीति का शिकार बन जाएगा?

दुनिया के सामने आज एक स्पष्ट विकल्प है — या तो वह भारत जैसे देशों के द्वारा लाए गए तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक कदम उठाए, या फिर वह यह स्वीकार कर ले कि भू-राजनीति आतंक पर भारी है।

भारत ने अपना कर्तव्य निभा दिया है। अब अंतरराष्ट्रीय मंचों की बारी है — केवल बैठकों और बयानों से नहीं, साहसिक निर्णयों से विश्व का भविष्य सुरक्षित होता है।


✍️ “यदि न्याय समय पर न हो, तो वह अन्याय बन जाता है। FATF के समक्ष अब केवल तकनीकी नहीं — नैतिक निर्णय की घड़ी है।”

 


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