भारत में विकास की चर्चा अक्सर ऊँची इमारतों और चौड़ी सड़कों पर अटक जाती है, जबकि असली तरक़्क़ी का पैमाना यह होना चाहिए कि हवा कितनी साफ़ है, पानी कितना बचा है, और पेड़ों की कतारें कितनी घनी हैं। इसी सोच को मज़बूत करने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक राज्यव्यापी संवाद में इंजीनियरों और योजनाकारों के सामने साफ़ कहा — “विकास का मतलब प्रकृति को हराना नहीं, उसके साथ जीना है।”
अतीत से सीख, भविष्य के लिए रास्ता
उन्होंने याद दिलाया कि पुराने समय में बनाए गए जलाशय और सिंचाई संरचनाएँ प्राकृतिक भूगोल के साथ मेल खाती थीं। जैसे राजस्थान के बावड़ियाँ, जो गर्मियों में भी पानी सहेजकर रखती हैं, या केरल के पारंपरिक जल-चक्र, जो बिना मशीनों के खेती को सहारा देते थे। ये उदाहरण बताते हैं कि स्थायी विकास हमारी मिट्टी की संस्कृति का हिस्सा रहा है।
हर परियोजना में पर्यावरण की शर्त
सरकार ने घोषणा की कि:
- सड़क मरम्मत का समय घटाकर चार दिन किया जाएगा।
- हर नई सड़क के साथ वर्षा जल रिसाव के लिए विशेष नाले बनाए जाएँगे।
- सरकारी भवनों में सौर ऊर्जा, वर्षा जल संचयन और हरित क्षेत्र अनिवार्य होंगे।
- निर्माण में निकली मिट्टी से छोटे जलाशय तैयार किए जाएँगे।
- गड्ढों की निगरानी मोबाइल ऐप से की जाएगी, जिससे पारदर्शिता बनी रहे।
तकनीक से जुड़ी सावधानी
“पीएम गति शक्ति” प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग करके सभी विभाग अपनी योजनाओं और भू-आकृतिक जानकारी को साझा करेंगे। इससे विकास कार्य शुरू होने से पहले ही पर्यावरणीय जोखिमों को पहचाना और टाला जा सकेगा।
इंजीनियर का नया दायित्व
सम्मेलन में पर्यावरणविदों ने कहा कि इंजीनियर को अब केवल ‘निर्माता’ नहीं, बल्कि ‘धरती का रक्षक’ भी बनना होगा। वृक्षारोपण को उन्होंने “आने वाली पीढ़ियों के लिए जमा पूँजी” बताया — ऐसा निवेश जो समय के साथ बढ़ता है और जिसका लाभ हर कोई उठाता है।
चुनौती: नीयत से नतीजे तक
यह पहली बार है जब राज्य के सभी इंजीनियरों को एक ही मंच पर विकास और पर्यावरण के संतुलन पर बात करने का अवसर मिला है। लेकिन अब असली परीक्षा इस बात की है कि क्या यह सोच रोज़मर्रा के कामकाज में उतर पाएगी। क्योंकि योजना बनाना आसान है, उसे ज़मीन पर उतारना कठिन।
अगर यह पहल सफल हुई, तो आने वाले सालों में मध्यप्रदेश का नक्शा सिर्फ़ सड़कों और इमारतों से नहीं, बल्कि हरियाली, साफ़ झीलों और जीवंत नदियों से पहचाना जाएगा।
Author: This news is edited by: Abhishek Verma, (Editor, CANON TIMES)
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