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Saturday, August 29, 2026, 4:16 pm

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दबाव नहीं, सम्मान चाहिए: भारत-अमेरिका व्यापार तनाव पर भारत का अडिग रुख

दबाव नहीं, सम्मान चाहिए: भारत-अमेरिका व्यापार तनाव पर भारत का अडिग रुख
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भारत और अमेरिका के रिश्तों में हाल ही में एक बार फिर खटास देखने को मिली है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 25% आयात शुल्क लगाने और रूस के साथ भारत के ऊर्जा व रक्षा संबंधों पर आपत्ति जताने के बाद यह साफ हो गया है कि यह व्यापारिक तनातनी अब केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रही—यह भारत की संप्रभुता और आत्मनिर्भर निर्णय क्षमता की परीक्षा बन गई है।

किसान, खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का सवाल

अमेरिका लंबे समय से भारत पर दबाव बना रहा है कि वह अपने कृषि और डेयरी बाजार को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोले। लेकिन भारत का ग्रामीण ढांचा, जो करोड़ों छोटे और सीमांत किसानों पर टिका है, किसी भी कीमत पर इस दबाव में नहीं झुक सकता। अमेरिकी मक्का, गेहूं और डेयरी उत्पादों की बाढ़ भारत के किसानों को आर्थिक गर्त में ढकेल सकती है। सरकार का इस क्षेत्र को संरक्षित रखना केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में लिया गया दूरदर्शी निर्णय है।

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भारत ने अतीत से सीखा है—जब 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान खाद्य आपूर्ति को एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया, तब देश ने खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता की राह चुनी थी। यह नीति आज भी भारत की खाद्य सुरक्षा का आधार है।

“अमेरिका फर्स्ट” बनाम “भारत का सम्मान”

भारत और अमेरिका के बीच जो द्विपक्षीय व्यापार वार्ता चल रही थी, उसका उद्देश्य आपसी लाभ होना चाहिए था। लेकिन “America First” नीति भारत से केवल एकतरफा समझौते की अपेक्षा कर रही है। यह न केवल असंतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है, बल्कि भारत की विदेश नीति को निर्देशित करने का प्रयास भी करता है—जो किसी भी आत्मनिर्भर राष्ट्र के लिए अस्वीकार्य है।

रूस के साथ भारत के रक्षा और ऊर्जा संबंधों को लेकर अमेरिका की आपत्ति यह दिखाती है कि वह भारत के स्वतंत्र निर्णयों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। लेकिन भारत का संदेश स्पष्ट है: हमारे कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्ते हमारे अपने रणनीतिक विवेक और राष्ट्रीय हितों से संचालित होते हैं—ना कि बाहरी दबावों से।

भारत की दृढ़ता: नई विश्व व्यवस्था का संकेत

भारत का यह स्पष्ट और अडिग रुख न केवल उसकी वैश्विक स्थिति को मजबूत करता है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि आर्थिक दबाव और धमकियों से कोई राष्ट्र झुकने वाला नहीं है, जो आत्मगौरव और लोकतंत्र में विश्वास रखता है। अमेरिका को यह समझना होगा कि वास्तविक साझेदारी बराबरी के आधार पर होती है, न कि संरक्षणवादी नीतियों के जरिए दबाव बनाकर।

“सम्मान से किया गया व्यापार संबंधों को मजबूत करता है, जबकि दबाव केवल दूरी बढ़ाता है।”

यह समय है जब अमेरिका को सहयोग और पारस्परिक सम्मान के सिद्धांतों को अपनाना चाहिए। और भारत को अपनी नीति और आत्मनिर्णय की स्वतंत्रता बनाए रखने के इस साहसिक रुख पर गर्व करना चाहिए।

 


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