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Wednesday, September 30, 2026, 1:38 pm

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एक पुल, जो भरोसे से पहले ढह गया

एक पुल, जो भरोसे से पहले ढह गया
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गुजरात के वडोदरा के पास,
महिसागर नदी पर बना गंभीर पुल अब बीते कल की बात है।
वो पुल जो लोगों को जोड़ने के लिए बना था,
अब खुद एक जुर्म की गवाही बन गया है।

बुधवार सुबह, जैसे ही पुल का एक हिस्सा टूटा,
ज़िन्दगियों के तार भी टूट गए।
11 लोग—कुछ अपने काम पर निकले थे,
कुछ घर लौट रहे थे। अब वे कभी वापस नहीं आएंगे।

CG

यह हादसा सिर्फ सीमेंट और स्टील के ढहने की कहानी नहीं है—
यह एक व्यवस्था के सड़ने की कहानी है।
जहां पुल बनते हैं बजट के आंकड़ों पर,
और गिरते हैं ज़मीर की चुप्पी पर।


वक्त से पहले क्यों टूटा यह पुल?

महज़ 45 साल पुराना यह पुल
उम्र के लिहाज़ से बूढ़ा नहीं था।
भारत में ऐसे कई पुल हैं जो इससे दोगुनी उम्र के हैं
और आज भी मजबूती से खड़े हैं—
फिर यह क्यों गिरा?

क्योंकि इसमें सिर्फ घटिया सामग्री नहीं लगी थी,
बल्कि शामिल था एक घटिया सोच का ढांचा—
जहां निर्माण से ज़्यादा ज़रूरी होता है ठेकेदार का कमीशन,
और निरीक्षण की जगह ले लेती है फाइलों की खानापूर्ति।


मोरबी से सबक नहीं लिया गया

2022 में मोरबी,
एक झूला पुल गिरा—137 लोग मारे गए।
उसके बाद हर मंच पर वादे हुए—
“सभी पुलों का ऑडिट होगा, मरम्मत होगी, जवाबदेही तय होगी।”

लेकिन जवाबदेही हमेशा राजनीतिक भाषणों में ही दम तोड़ती है।
212 करोड़ रुपये नए पुल के लिए स्वीकृत हुए—
पर कागज़ों से निकल कर धरातल तक कभी नहीं पहुंचे।

चेतावनियां दी गईं थीं।
स्थानीय पंचायत सदस्य H.S. परमार ने पुल की हालत बताई थी।
पर जब सच्ची बातें असुविधाजनक हों,
तो वो अक्सर फाइलों के पीछे दबा दी जाती हैं।


अब क्या होना चाहिए?

अब वक्त है सिर्फ पुल बनाने का नहीं,
बल्कि उस भरोसे को दोबारा गढ़ने का,
जो हर यात्री इस उम्मीद से करता है—
कि पुल पार करते समय ज़िंदगी सलामत रहेगी।

  • एक स्वतंत्र और निष्पक्ष ऑडिट होना चाहिए—राज्य के हर पुल का।
  • निर्माण में गुणवत्ता और पारदर्शिता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
  • और सबसे ज़रूरी—भ्रष्टाचार को शून्य सहनशीलता से देखा जाए।

एक पुल सिर्फ रास्ता नहीं होता,

वह एक वादा होता है—

कि हम आपकी ज़िंदगी को सुरक्षित रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

इस बार यह वादा टूट गया।
अब ज़रूरत है कि हर ईंट, हर नट-बोल्ट, और हर फ़ैसला
इस देश की जनता के प्रति ईमानदार हो।


🔹 क्या हम फिर से पुलों पर भरोसा कर पाएंगे?

शायद हाँ—अगर अगली बार वो सिर्फ पत्थर से नहीं,
बल्कि नीयत से बनाए जाएं।

 


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