Explore

Search

Tuesday, January 20, 2026, 11:29 pm

Tuesday, January 20, 2026, 11:29 pm

उपराष्ट्रपति चुनाव: जब जीत आसान हो और चुनौती कठिन

उपराष्ट्रपति चुनाव: जब जीत आसान हो और चुनौती कठिन
Share This Post

भारतीय लोकतंत्र की सबसे दिलचस्प विडंबना यही है कि यहाँ चुनावों के नतीजे पहले से साफ़ हो सकते हैं, लेकिन असली परीक्षा सत्ता के गलियारों से बाहर शुरू होती है। उपराष्ट्रपति का चुनाव इसका ताज़ा उदाहरण है। संसद का गणित कहता है कि सी.पी. राधाकृष्णन निर्विवाद रूप से जीतेंगे। सवाल यह नहीं है कि कौन उपराष्ट्रपति बनेगा, बल्कि यह है कि यह पद सत्ता की छाया में बौना रहेगा या फिर संविधान की गरिमा को नई ऊँचाई देगा।

संवैधानिक पद: सत्ता की मुहर या जनता की उम्मीद?

ध्यान देने वाली बात यह है कि पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का कार्यकाल अचानक समाप्त हुआ। यह सिर्फ़ एक व्यक्तिगत घटना नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति का संकेत है जिसमें संवैधानिक पदों का अस्तित्व सरकार की स्वीकृति पर टिक जाता है। लोकतंत्र का असली मूल्य तब घटने लगता है जब पद व्यक्ति का नहीं, बल्कि किसी दल का प्रवक्ता बन जाए।

CG

राधाकृष्णन: संगठनप्रिय चेहरा या स्वतंत्र व्यक्तित्व?

सी.पी. राधाकृष्णन लंबे समय से भाजपा संगठन से जुड़े हैं और पार्टी के अनुशासित सिपाही माने जाते हैं। उनका दक्षिण भारत से आना भाजपा की चुनावी रणनीति का हिस्सा है। लेकिन उपराष्ट्रपति पद केवल राजनीतिक समीकरणों से तय नहीं होता। यहाँ सवाल यह है कि क्या वे राज्यसभा की गरिमा को बनाए रखने के लिए खुद को संगठन की सीमाओं से ऊपर रख पाएँगे?

राज्यसभा: लोकतंत्र का असली दर्पण

लोकसभा बहुमत की ताकत दिखाती है, लेकिन राज्यसभा संतुलन और विमर्श की पहचान है। उपराष्ट्रपति बतौर सभापति इसी संतुलन के संरक्षक होते हैं। यदि यह पद केवल बहुमत की गूँज बनकर रह जाए, तो लोकतंत्र का वह पहलू ही खो जाएगा जो असहमति को जगह देता है। राधाकृष्णन का असली इम्तिहान यही होगा कि वे सदन को संवाद का मंच बनाते हैं या महज़ सत्ता का प्रतिध्वनि-स्थल।

जीत की निश्चितता, जिम्मेदारी की अनिश्चितता

राधाकृष्णन की जीत पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि उनकी असली चुनौती जीत के बाद शुरू होगी। पद की गरिमा उनकी स्वतंत्रता पर टिकी होगी, न कि उनकी संगठन-निष्ठा पर। लोकतंत्र का स्वास्थ्य तभी सुरक्षित रहेगा जब संवैधानिक पदाधिकारी यह साबित करें कि वे सरकार से नहीं, संविधान से जवाबदेह हैं।

निष्कर्ष

यह उपराष्ट्रपति चुनाव किसी राजनीतिक रोमांचक कथा जैसा नहीं है, क्योंकि परिणाम पहले से स्पष्ट है। लेकिन यह संवैधानिक कसौटी ज़रूर है। विपक्ष भले हाशिए पर चला गया हो, पर लोकतंत्र का मूल्यांकन केवल सत्ता के आँकड़ों से नहीं होगा। असली पैमाना यही होगा कि क्या नया उपराष्ट्रपति उच्च सदन को स्वतंत्रता और गरिमा के साथ चला पाता है या नहीं।


Share This Post

Leave a Comment