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Tuesday, January 20, 2026, 11:28 pm

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एक देश, एक चुनाव: लोकतंत्र के लिए अवसर या जोखिम?

एक देश, एक चुनाव: लोकतंत्र के लिए अवसर या जोखिम?
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भारत में वन नेशन, वन इलेक्शन (एक देश, एक चुनाव) को लेकर चर्चा ने फिर जोर पकड़ा है। पहली नज़र में यह प्रस्ताव सरल और आकर्षक लगता है—एक साथ चुनाव होंगे तो खर्च घटेगा, प्रशासन का समय बचेगा और सरकारें लगातार चुनावी राजनीति में उलझी नहीं रहेंगी। लेकिन असल सवाल यह है कि क्या सुविधा और खर्च की बचत, लोकतंत्र की विविधता से ज़्यादा महत्वपूर्ण है?

क्यों उठता है यह विचार

आज भारत लगभग हर साल किसी न किसी राज्य में चुनावी मोड में रहता है। इसका असर यह होता है कि सरकारें दीर्घकालिक नीति के बजाय अल्पकालिक घोषणाओं और लोकलुभावन योजनाओं पर ज़्यादा ध्यान देती हैं। समर्थकों का तर्क है कि यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ हो जाएं तो यह समस्या दूर हो सकती है।

CG

चुनौतियाँ क्या हैं

भारत जैसे विशाल और विविध देश में यह मॉडल इतना आसान नहीं है। हर राज्य की अपनी राजनीतिक ज़मीन और सामाजिक लय है। यदि सभी चुनाव एक साथ होंगे, तो राष्ट्रीय मुद्दे हावी हो जाएंगे और राज्यों के स्थानीय सवाल दब सकते हैं। इससे संघीय ढाँचा कमजोर होने का खतरा है।

इसके अलावा, अगर किसी राज्य की सरकार बीच कार्यकाल में गिरती है तो क्या पूरे देश को फिर चुनाव में झोंका जाएगा? या उस राज्य की जनता को तब तक इंतजार करना होगा जब तक राष्ट्रीय चुनाव न आएं? यह व्यावहारिक समस्या लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित कर सकती है।

संभावित रास्ते

समाधान केवल चुनावों को “एक साथ” कर देने में नहीं है। राजनीतिक अस्थिरता रोकने के लिए नो कॉन्फिडेंस वोट में सुधार किया जा सकता है, ताकि सरकार केवल तब गिरे जब कोई नया नेतृत्व तैयार हो। चुनाव आयोग को तकनीकी साधनों और संसाधनों से और मज़बूत बनाया जा सकता है ताकि बार-बार चुनाव कराने की कठिनाइयाँ कम हों।

लोकतंत्र का असली मतलब

भारत में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का औपचारिक माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह लोकतंत्र का सबसे जीवंत उत्सव हैं। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग समय पर चुनाव होना हमारी लोकतांत्रिक विविधता का सबूत है। यह लोगों को बार-बार अपनी आवाज़ उठाने का मौका देता है।

नतीजा

वन नेशन, वन इलेक्शन विचार नया नहीं है, लेकिन इसे लागू करना आसान भी नहीं है। खर्च बचाने और सुविधा पाने की होड़ में हमें लोकतंत्र की आत्मा—संघीय संतुलन, बहुलतावाद और जनता की भागीदारी—को कमज़ोर नहीं करना चाहिए। असली सुधार वही होगा जो शासन को स्थिर रखे और साथ ही भारत की विविधता को सम्मान दे।


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