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Wednesday, February 11, 2026, 9:07 am

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श्रमिकों का भविष्य: नीतियों से ज़्यादा नीयत की ज़रूरत

श्रमिकों का भविष्य: नीतियों से ज़्यादा नीयत की ज़रूरत
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भारत की अर्थव्यवस्था की चकाचौंध के पीछे असली ताक़त उन श्रमिकों की है जिनकी मेहनत से फैक्ट्रियाँ चलती हैं और सड़कें बनती हैं। मगर सच्चाई यह भी है कि दशकों से यही वर्ग सबसे उपेक्षित रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने श्रमिक कल्याण योजनाओं की समीक्षा कर जो संदेश दिया है, वह सिर्फ़ प्रशासनिक कवायद नहीं बल्कि इस उपेक्षा को तोड़ने का प्रयास है।

योजनाएँ नहीं, असर चाहिए

संबल योजना हो, ई-श्रम पोर्टल पर पंजीयन या युवा संगम—ऐसी पहलों की कमी कभी नहीं रही। कमी रही है तो उनके असर की। मुख्यमंत्री का यह कहना अहम है कि लाभ तभी दिखेगा जब निगरानी लगातार हो और पहुँच वास्तविक श्रमिक तक बने। यही वह बिंदु है जहाँ नारा और नीयत में अंतर स्पष्ट होता है।

CG

तकनीक से जवाबदेही

ग्राम सभाओं को निगरानी का माध्यम बनाना और डिजिटल सिस्टम से पारदर्शिता लाना एक बड़ा बदलाव है। अब अगर योजनाओं का पैसा बीच में कहीं रुकता है तो उसकी ज़िम्मेदारी तय होगी। यही भरोसा किसी भी कल्याणकारी कार्यक्रम की बुनियाद है।

राहत से अधिकार की ओर

नई SHREE पहल का मक़सद श्रमिकों को केवल राहत नहीं बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और उद्यम के अवसर देना है। यह सोच बताती है कि श्रमिक अब केवल मज़दूरी करने वाला हाथ नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य का हकदार नागरिक माना जा रहा है।

असली सवाल: टिकेगा कितने दिन?

भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है—कई कल्याण योजनाएँ आईं और कुछ सालों में धुंधली हो गईं। अगर श्रमिक कल्याण भी उसी राह पर गया तो न तो विकास समावेशी कहलाएगा और न ही न्यायपूर्ण। असली चुनौती है इन प्रयासों को निरंतरता और मज़बूत संस्थागत ढाँचे से जोड़ना।

निष्कर्ष

भारत के विकास की गति तभी टिकाऊ होगी जब श्रमिक इसके हाशिए पर नहीं, केंद्र में हों। डॉ. मोहन यादव की पहल उम्मीद जगाती है, लेकिन सवाल यही है—क्या यह शुरुआत एक स्थायी दिशा बनेगी या फिर एक और अधूरा वादा?


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