मोदी सरकार द्वारा वर्ष 2014 में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं — एल.के. आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, और जसवंत सिंह — को “75 वर्ष की आयु सीमा” के आधार पर मार्गदर्शक मंडल में भेजना, अब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने एक बूमरैंग बनकर लौटता दिख रहा है।
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में दिए बयान में कहा कि “75 की उम्र के बाद व्यक्ति को जिम्मेदार पद से खुद हट जाना चाहिए।” यह बात उन्होंने दिवंगत संघ नेता मोरोपंत पिंगले के विचारों के संदर्भ में कही — लेकिन राजनीतिक हलकों में इस बयान को महज़ स्मृति नहीं, बल्कि एक साफ़ संकेत माना गया है।
दोनों नेता 75 के करीब: इत्तेफ़ाक या इशारा?
सितंबर 2025 में मोदी और भागवत दोनों ही 75 वर्ष के हो जाएंगे। विपक्ष ने तुरंत इस मुद्दे को लपकते हुए कहा कि यह भागवत द्वारा मोदी के लिए परोक्ष संदेश है — समय आ गया है कि अब वे खुद पीछे हटने की तैयारी करें।
हालांकि, भाजपा और संघ दोनों ने इसे “अत्यधिक अटकल” कहकर खारिज किया, और दोहराया कि आरएसएस भाजपा के फैसलों में दखल नहीं देता।
2024 का सबक: संघ का समर्थन अनिवार्य
2024 के लोकसभा चुनावों में आरएसएस के स्वयंसेवकों की जमीनी स्तर पर अनुपस्थिति ने भाजपा के लिए नुकसानदेह परिणाम दिए।
मोदी के ‘400 पार’ के दावे, और खुद को ‘ईश्वर का गैर-जैविक पुत्र’ बताने वाले बयानों ने संघ में बेचैनी और दूरी पैदा की।
जेपी नड्डा का बयान — “भाजपा अब संघ की मोहताज नहीं” — संघ के भीतर एक गहरी नाराजगी का कारण बना। नतीजा? उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, और हरियाणा जैसे बड़े राज्यों में भाजपा को कई अहम सीटों पर हार झेलनी पड़ी।
भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई, और बहुमत से 32 सीट पीछे रह गई। अंततः नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू के समर्थन से सत्ता में वापसी संभव हो सकी।
मुलाकातें, संदेश और नए समीकरण
मार्च 2025 में नरेंद्र मोदी की नागपुर आरएसएस मुख्यालय यात्रा — सत्ता में 11 साल पूरे होने के बाद पहली बार — एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम था।
अरविंद केजरीवाल ने दावा किया कि मोदी अपनी संभावित सेवानिवृत्ति को लेकर संघ से चर्चा करने गए थे। हालांकि, अमित शाह ने तुरंत यह कहकर खंडन किया कि प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा करेंगे।
इसी दौरान, भाजपा के कई नए राज्य अध्यक्षों की नियुक्ति में संघ की पृष्ठभूमि वाले नेताओं को प्रमुखता मिली — एक और संकेत कि संघ अब नेतृत्व पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है।
क्या संघ अब दबाव की राजनीति में?
जेपी नड्डा का कार्यकाल जून 2024 में समाप्त हो गया, लेकिन वह अभी भी पार्टी अध्यक्ष हैं — साथ ही केंद्र सरकार में मंत्री भी। यह दोहरी भूमिका भी संघ के लिए असहज रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भागवत का बयान केवल नैतिकता की बात नहीं, बल्कि भविष्य की रणनीति का संकेत है — भाजपा का नेतृत्व कौन संभालेगा, अब यह संघ के प्रभाव में तय होगा।
निष्कर्ष: सत्ता के गलियारों में बदलती हवाएं
2014 में जिन्हें 75 पार बताकर “मार्गदर्शक” बना दिया गया, आज वही उम्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने एक सवाल बनकर खड़ी है।
भले ही भागवत सीधा दबाव न डालें, लेकिन इतना तय है कि अब संघ भाजपा की हाँ में हाँ मिलाने वाला संगठन नहीं रह गया।
राजनीतिक सत्ता और वैचारिक आधार के बीच यह खिंचाव आने वाले समय में और तेज़ हो सकता है।
Author: This news is edited by: Abhishek Verma, (Editor, CANON TIMES)
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