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Tuesday, January 20, 2026, 7:35 pm

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आयुष्मान भारत: उम्मीद की डोर या अधूरी प्रतिज्ञा?

आयुष्मान भारत: उम्मीद की डोर या अधूरी प्रतिज्ञा?
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जब बीमारी और गरीबी साथ-साथ आती हैं, तो आम आदमी के सामने ज़िंदगी और मौत के बीच की खाई और गहरी हो जाती है। झारखंड सीमा से लगे जशपुर के मज़दूर वीरेंद्र खाखा की कहानी इसी सच्चाई का आईना है। कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी, महँगे इलाज का असंभव बोझ और एक मज़दूर की सीमित आय—यह सब मिलकर उनकी ज़िंदगी को निराशा की अंधेरी सुरंग में धकेल रहा था। लेकिन आयुष्मान भारत योजना उनके लिए उस सुरंग के अंत में उम्मीद की रोशनी बनी।

योजना का असली चेहरा: आँकड़ों से परे

हमारी बहसें अक्सर योजनाओं को आँकड़ों तक सीमित कर देती हैं—कितने कार्ड बने, कितने करोड़ खर्च हुए, कितने लोग लाभान्वित हुए। लेकिन इन निर्जीव संख्याओं के पीछे इंसानी किस्से छिपे हैं। खाखा का इलाज अगर बिना आयुष्मान कार्ड के होता, तो शायद उनका पूरा परिवार कर्ज़ के दलदल में डूब जाता। यह योजना सिर्फ़ इलाज नहीं देती, यह इज़्ज़त और जीने की संभावना भी लौटाती है।

CG

विकेन्द्रीकरण का सबक

खाखा का इलाज सिर्फ़ रायपुर जैसे बड़े शहर में ही नहीं, बल्कि जशपुर के ज़िला अस्पताल में भी जारी रहा। यह दिखाता है कि स्वास्थ्य सेवाओं का विकेन्द्रीकरण कितना अहम है। अगर सारी सुविधाएँ महानगरों तक ही सीमित रह जाएँ, तो दूर-दराज़ के ग़रीब नागरिक कैसे पहुँचेंगे? आयुष्मान भारत का यही बड़ा योगदान है कि इसने बड़े अस्पतालों और छोटे ज़िला केंद्रों के बीच एक सेतु बनाया।

डॉक्टरों की अनसुनी मेहनत

नीतियाँ कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर काम करने वाले लोग उन्हें जीवंत बनाते हैं। जशपुर के डॉक्टर लक्ष्मीकांत आप्टे और उनकी टीम ने साबित किया कि स्वास्थ्य सेवा केवल “योजना” नहीं है, बल्कि सेवा-भाव और प्रतिबद्धता का नाम है।

अपवाद नहीं, सामान्य हक़

फिर भी सवाल यह है कि क्या हर रोगी को खाखा जैसा अनुभव मिल रहा है? सच्चाई यह है कि अभी भी हज़ारों लोग काग़ज़ी झंझट, अधूरी जानकारी और असमान अमल के कारण इस योजना से वंचित हैं। अगर आयुष्मान भारत को सचमुच “गरीब का संबल” बनना है, तो हर वीरेंद्र खाखा की कहानी को अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य अनुभव बनाना होगा।

निष्कर्ष: लोकतंत्र की असली कसौटी

आयुष्मान भारत महज़ एक स्वास्थ्य योजना नहीं है, यह लोकतंत्र की नैतिकता की परीक्षा है। अगर सबसे ग़रीब को भी यह भरोसा हो कि गम्भीर बीमारी उसकी ज़िंदगी को तबाह नहीं करेगी, तो यह लोकतंत्र के असली वादे की पूर्ति है। वीरेंद्र खाखा की मुस्कान सिर्फ़ एक व्यक्ति की जीत नहीं, बल्कि इस विचार की जीत है कि स्वास्थ्य सुविधा कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार है।


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