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Tuesday, January 20, 2026, 12:22 pm

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क्या भारत की विदेश नीति अब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का औजार बन गई है?

क्या भारत की विदेश नीति अब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का औजार बन गई है?
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“कूटनीति, विज्ञापन नहीं होती; यह राष्ट्रहित की ठोस रणनीति होती है।”

  • हेनरी किसिंजर की यह सोच आज के भारत पर पूरी तरह लागू होती दिख रही है।

बीते एक दशक में भारत की विदेश नीति में जितनी चकाचौंध दिखाई गई है, उतनी ही गंभीर दिशाहीनता भी नजर आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत की विदेश नीति का चेहरा ग्लैमर, व्यक्तिगत संबंधों और इवेंट्स की राजनीति बन गया है—जहां राष्ट्रीय हित कई बार राजनीतिक एजेंडे और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के पीछे दबते दिखते हैं।

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🧭 दिशा भ्रम: दो महाशक्तियों के बीच उलझा भारत

भारत की रणनीति कभी अमेरिका के साथ दोस्ती की कोशिश करती है, तो कभी चीन के साथ झूले पर बैठती है। लेकिन गालवान घाटी की हिंसा और ऑपरेशन सिंदूर जैसी घटनाएं बताती हैं कि इस व्यक्तिगत कूटनीति का कोई स्थायी लाभ नहीं हुआ

अमेरिका में चुनावों के दौरान ट्रंप के लिए “अबकी बार ट्रंप सरकार” का नारा लगाने वाले मोदी, ट्रंप के जीतते ही शर्मिंदा हुए, और वहीं शी जिनपिंग की मेहमाननवाजी के बाद चीन ने लद्दाख में सैनिक झड़प कर दी।

📉 पड़ोसी देशों से रिश्ते लगातार बिगड़ते जा रहे हैं

  • बांग्लादेश, जो कभी भारत का निकटतम मित्र था, आज चीन के करीब जा चुका है।
  • मालदीव में भारतीय सेना को ‘अनवांटेड’ घोषित किया गया।
  • कनाडा से संबंध इस कदर खराब हुए कि G-7 सम्मेलन में भारत को आमंत्रण तक देर से मिला
  • ईरान, जिसके साथ भारत के सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंध हैं, वहां के राष्ट्रपति से बात करने के लिए फोन तेहरान से करवाना पड़ा।

🌍 वैश्विक मंच पर भी भारत अकेला खड़ा है

भारत लगातार दुनिया को समझाने की कोशिश कर रहा है कि पाकिस्तान आतंकवाद को प्रायोजित करता है, लेकिन हकीकत यह है कि—

  • पाकिस्तान UN की काउंटर टेररिज्म कमेटी का उपाध्यक्ष है।
  • जुलाई में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष भी वही है।
  • अमेरिका के जनरल उसे ‘आतंक के खिलाफ अहम साझेदार’ बताते हैं।

ये सब दर्शाता है कि भारत की बात अब वैश्विक मंचों पर उतनी गंभीरता से नहीं सुनी जा रही, जितनी कभी सुनी जाती थी।

⚖️ साफ रुख नहीं, वोट बैंक की कूटनीति

कभी भारत नैतिक कूटनीति का उदाहरण हुआ करता था। आज—

  • गाज़ा संघर्ष पर भारत ने संयुक्त राष्ट्र में मतदान से परहेज किया
  • ईरान-इज़रायल संघर्ष पर SCO समिट में कोई स्थिति स्पष्ट नहीं की गई।
  • यूक्रेन-रूस युद्ध में मध्यस्थता की ऐतिहासिक भूमिका निभाने का अवसर गंवा दिया।

क्या ये सब किसी वैचारिक झिझक या घरेलू राजनीति के प्रभाव के कारण हुआ?

📚 किसिंजर की चेतावनी आज क्यों प्रासंगिक है?

हेनरी किसिंजर ने नेपोलियन पर टिप्पणी करते हुए लिखा था,

“नेपोलियन ने विदेशी नीति को जादू की चालों में बदल दिया… अंततः सच्चाई तय करती है कि किसी नेता ने फर्क डाला या सिर्फ भ्रम फैलाया।”

क्या मोदी सरकार की विदेश नीति भी इवेंट्स, नारों और व्यक्तिगत छवि निर्माण तक सिमट कर रह गई है?


🛑 निष्कर्ष: क्या विदेश नीति घरेलू राजनीति की बंदी बन गई है?

हर प्रधानमंत्री को अपनी विदेश नीति तय करने का अधिकार है। लेकिन जब विदेश नीति—

  • व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं,
  • वैचारिक दबावों, और
  • घरेलू राजनीतिक लाभों के आधार पर बनाई जाए,

तो यह राष्ट्रीय हितों के लिए खतरनाक हो सकता है।

आज ज़रूरत है एक ऐसी नीति की—

  • जो स्थायित्व और स्पष्टता पर आधारित हो,
  • जो राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक साख को प्राथमिकता दे,
  • और जो सिर्फ इवेंट नहीं, बल्कि दूरदर्शी रणनीति हो।

 


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