नाम में क्या रखा है?
शायद सब कुछ — अगर आप आज के भारत में फिल्म बना रहे हैं।
मलयालम फिल्म “J.S.K: Janaki vs State of Kerala” अचानक एक कानूनी रणभूमि में तब्दील हो गई—न कथानक को लेकर, न कंटेंट को लेकर—बल्कि सिर्फ एक नाम को लेकर।
“जानकी” — एक ऐसा नाम जिसे अब पवित्रता के पैमाने पर तौलने की कवायद शुरू हो चुकी है।
क्यों?
क्योंकि जानकी का नाम माँ सीता का पर्याय है, और माँ सीता धार्मिक भावनाओं से जुड़ी हैं।
और इस फिल्म में जानकी कोई देवी नहीं है,
बल्कि एक बलात्कार पीड़िता, जो अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाती है।
संवेदनशीलता या सेंसरशाही?
सेंसर बोर्ड, जिसे फिल्मों के लिए ‘सुरक्षा कवच’ माना जाता है, इस बार खुद एक हठधर्मी प्रहरी बन बैठा।
उसे आपत्ति थी कि इस नाम का इस्तेमाल एक पीड़िता के लिए कैसे किया जा सकता है?
उन्होंने 90 से ज़्यादा कट्स सुझाए —
जैसे किसी कलाकार की आत्मा को टुकड़ों में बांटकर फिर जोड़ने की कोशिश हो।
यह बात गौण हो गई कि फिल्म यौन हिंसा जैसे ज्वलंत मुद्दे पर आधारित है,
या कि पीड़िता की लड़ाई एक पूरे समाज की आंखें खोल सकती है।
सिर्फ इतना मायने रखता था — नाम ने किसी की भावनाएं ठेस पहुंचाई हैं।
न्याय ने जहाँ विवेक दिखाया
लेकिन जब सेंसर की कैंची ने कल्पना को जकड़ लिया,
तब केरल हाईकोर्ट ने वह किया जो आजकल दुर्लभ होता जा रहा है —
उसने तर्क मांगा।
जस्टिस एन. नागरेश ने साफ कहा:
“अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” महज एक संवैधानिक अनुच्छेद नहीं,
बल्कि हर कलाकार की आत्मा है।
और किसी काल्पनिक किरदार का धार्मिक नाम होना
उसे अपराध नहीं बना देता।
अगर हम ऐसे नामों से डरने लगे,
तो फिर देश के आधे दस्तावेज रद्द करने पड़ेंगे —
जहां हर तीसरे व्यक्ति का नाम धर्म से जुड़ा होता है।
हमारी स्मृति कितनी सुविधाजनक है?
- मुहम्मद नाम वाले एक किरदार के कारण एक प्रोफेसर का हाथ काट दिया गया।
- ‘मरियाकुट्टी’ नाम पर बनी दो फिल्में विवाद के बिना निकल गईं।
- ‘सीता और गीता’, ‘राम और लक्ष्मण’, ‘हनुमान बना सुपरमैन’ —
कभी कोई केस नहीं, कोई विरोध नहीं।
लेकिन आज,
कला, संस्कृति और कल्पना को
सिर्फ एक धार्मिक चश्मे से देखा जा रहा है —
जहां विचार से ज़्यादा विवाद मायने रखता है।
‘V’ — एक अक्षर, एक विजय
अंततः, फिल्म का नाम बदल दिया गया:
अब यह “V. Janaki vs State of Kerala” है।
बस एक छोटा सा “V.”
जिसने फिल्म को सेंसर के शिकंजे से बचाया —
और शायद हमारी सोच को भी थोड़ा राहत दी।
क्योंकि बदलाव की असली ज़रूरत जानकी को नहीं, हमें है—
हम, जो कल्पना से डरने लगे हैं।
हम, जो नाम में नीयत नहीं,
बल्कि अपमान ढूंढने लगते हैं।
और हम—
जो हर बार विवेक को सेंसर करते हैं,
पर फिर भी खुद को लोकतंत्र कहते हैं।
आज का सच यही है:
‘V’ सिर्फ ‘विक्ट्री’ नहीं है,
यह ‘विवेक’, ‘विचार’ और ‘विविधता’ की भी जीत है।
Author: This news is edited by: Abhishek Verma, (Editor, CANON TIMES)
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