आज की बदलती भू-राजनीति में भारत ऐसी स्थिति में है जहाँ उसे आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक साझेदारियों के बीच बेहद संवेदनशील संतुलन साधना पड़ रहा है। हाल ही में अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर 25% अतिरिक्त शुल्क लगाने की घोषणा, रूस से भारत के तेल आयात को लेकर, इसी संतुलन को चुनौती दे रही है।
तेल से बढ़ता दबाव
यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद, जब यूरोप ने रूसी तेल से दूरी बनाई, भारत ने अवसर का उपयोग करते हुए रियायती दरों पर यूरल क्रूड खरीदना तेज कर दिया। कुछ ही महीनों में, रूस की हिस्सेदारी भारत के तेल आयात में 35–40% तक पहुँच गई। इस रणनीति से अरबों डॉलर की बचत और स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित हुई, लेकिन पश्चिमी देशों को यह रुख अप्रिय लगा।
पुराने रिश्तों का बोझ
रूस दशकों से भारत का अहम रक्षा और ऊर्जा साझेदार रहा है। उसे अचानक छोड़ना केवल आर्थिक झटका नहीं होगा, बल्कि भारत की विदेश नीति की स्वतंत्रता पर भी असर डालेगा—जैसा 2018 में ईरान और वेनेज़ुएला से आयात रोकने पर हुआ था, जब भारत को न केवल नुकसान उठाना पड़ा, बल्कि अपनी कूटनीतिक छवि भी खोनी पड़ी।
अमेरिकी समीकरण
दूसरी ओर, अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदारों में से एक है और रक्षा, प्रौद्योगिकी, तथा इंडो-पैसिफिक सहयोग में भी प्रमुख भूमिका निभाता है। अगर ये नए शुल्क लंबे समय तक लागू रहे, तो न सिर्फ़ निर्यात प्रभावित होंगे, बल्कि वर्षों से बन रही रणनीतिक नज़दीकी भी कमजोर हो सकती है।
कूटनीति की दोधारी तलवार
अब भारत के सामने विकल्प साफ नहीं हैं—रूस से तेल आयात घटाना अमेरिकी संबंधों को सुधार सकता है, लेकिन इससे ऊर्जा लागत और आपूर्ति पर खतरा होगा। वहीं, रूस के साथ संबंध बनाए रखना अमेरिका के साथ व्यापारिक टकराव को गहरा सकता है।
आगे की संभावनाएँ
व्हाइट हाउस ने इशारा किया है कि यदि यूक्रेन युद्ध का समाधान होता है, तो भारत पर लगे ये शुल्क हट सकते हैं। इसके अलावा, कोई अंतिम समय का व्यापार समझौता—जिसमें भारत कुछ बाज़ार पहुंच संबंधी रियायतें दे—तनाव कम कर सकता है।
निष्कर्ष
यह केवल तेल का मामला नहीं है; यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक पटल पर उसकी स्थिति की असली परीक्षा है। जो भी रास्ता चुना जाएगा, वह आने वाले वर्षों में भारत की विदेश नीति की दिशा तय करेगा।
Author: This news is edited by: Abhishek Verma, (Editor, CANON TIMES)
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