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Wednesday, February 11, 2026, 7:57 pm

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रायसेन की धरती पर विरासत और विकास का संगम

रायसेन की धरती पर विरासत और विकास का संगम
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रायसेन ज़िले के महलपुर पाथा गाँव में खड़ा प्राचीन राधा–कृष्ण मंदिर सिर्फ़ एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह मध्य भारत की सांस्कृतिक गाथा का साक्षात प्रमाण है। इसी स्थल पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने ऐलान किया कि इस मंदिर को पुनर्जीवित कर भव्य तीर्थस्थल बनाया जाएगा और इसे स्थानीय विकास की धुरी से जोड़ा जाएगा। उन्होंने अपने विचार को एक पंक्ति में समेटा “विरासत से विकास तक, यही हमारा मार्ग है।”

यह संदेश केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं था। जब मुख्यमंत्री ने कृष्ण के मयूर-पंख का उल्लेख करते हुए गाँवों की आत्मा और लोकसंस्कृति की बात की, तब वे शासन और नीति को संस्कृति से जोड़ रहे थे। कंस का अंत करने वाले कृष्ण को उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों का वाहक और ग्रामीण जीवन का संरक्षक बताया।

CG

लेकिन यह भाषण केवल प्रतीकों तक नहीं रुका। डॉ. यादव ने मंदिर के संरक्षण के साथ-साथ सांची क्षेत्र के लिए 136 करोड़ रुपये की विकास योजनाओं की घोषणा भी की। इनमें आदिवासी इलाकों को सड़क सुविधा से जोड़ना, अस्पतालों का विस्तार और नई सार्वजनिक सेवाएँ शामिल थीं। उनका संदेश साफ था भोपाल और इंदौर की तरह रायसेन और विदिशा भी बदलाव की धारा में शामिल होंगे।

यहीं से एक बड़ा सवाल उभरता है। क्या धार्मिक धरोहरों का संरक्षण सामाजिक विकास पर हावी हो जाएगा? या फिर यह दोनों धाराएँ मिलकर एक नई राह बनाएँगी? वास्तविकता यह है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और सड़कें ही नागरिक जीवन की नींव हैं। लेकिन यदि इन मूलभूत ज़रूरतों के साथ सांस्कृतिक पुनर्जागरण भी जुड़ता है तो समाज को मज़बूती और पहचान दोनों मिलती हैं।

महलपुर पाथा मंदिर का कायाकल्प केवल स्थापत्य की मरम्मत नहीं होगा, बल्कि यह क्षेत्र की सामूहिक स्मृति और गौरव का पुनर्निर्माण होगा। वार्षिक मेले की योजना इस विरासत को जीवंत बनाएगी, जहाँ संस्कृति और अर्थव्यवस्था साथ-साथ चलेंगे।

अब परीक्षा सरकार की ईमानदारी की है। क्या यह परियोजनाएँ केवल घोषणा-पत्र बनकर रह जाएँगी या ज़मीनी हक़ीक़त भी बनेंगी? क्या संरक्षण विशेषज्ञता और संवेदनशीलता से होगा या केवल चमक-दमक तक सिमट जाएगा? और क्या विकास केवल मंदिर तक सीमित रहकर प्रचार का माध्यम बनेगा या गाँव-गाँव तक पहुँचेगा?

इतिहास यह कहता है कि धरोहर पत्थरों में नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में जीवित रहती है। जब शासन धर्म, नीति और जिम्मेदारी को साथ लेकर चलता है, तभी विरासत वास्तव में पुनर्जीवित होती है। यदि यह संतुलन कायम रहा तो रायसेन की यह पहल अतीत को संजोते हुए भविष्य की दिशा भी तय करेगी।

 


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