बांग्लादेश एक बार उस आदर्श का चेहरा था, जिसने धार्मिक विविधता और लोकतांत्रिक विश्वास को मिलाकर अपनी पहचान बनाई थी। 1971 के संघर्ष ने देश को सेक्युलरता का एक मॉडल मान्यता दिलाई। लेकिन अब उस पहचान पर संकट है—महज़ राजनीतिक संक्रमण नहीं, बल्कि विचारों की संरचना ही बदल रही है।
धार्मिक कट्टरता का विस्तार न केवल हिंसक है, बल्कि औचित्य के नाम पर गढ़े जा रहे एक सांस्कृतिक तंत्र का हिस्सा है। भीड़ हत्याओं में भयावह उछाल बताता है कि कानून नहीं, अफवाहों और धर्मनिरपेक्ष बुनियाद पर हमला हो रहा है। संविधान की किताबों में अब गुमान भर बचा है—उसकी जगह ले रहे हैं धर्मवादियों द्वारा रचित नयी सामूहिक मानसिकताएं।
विभाजन-पश्चात जब बांग्लादेश ने अपने नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का भरोसा दिया, तो वह एक साहसी फैसला था। आज वही साहस पीछे हट रहा है। शेख मुजीब की भावना, जिसकी मूर्तियाँ गिराई जा रही हैं, सिर्फ स्मृति नहीं—देश की बहुलता की घोषणा थी। उसे मिटा देने का मतलब है देश को एकरूप और उसूलों से वंचित करना।
आज विश्वविद्यालय, सांस्कृतिक मंच, मीडिया—सब जगह विचारों की आवाज़ दबाये जा रहे हैं। छोटे से छोटा प्रश्न भी, धर्म-निष्ठ संगठन द्वारा खतरनाक माना जाता है। विरोधी राजनीतिक दल कमजोर नहीं, अविकसित सामाजिक मूल्यों के शिकार हैं। कौन कह सकता है कि जनमत अभी जीवित नहीं? पर वह मान्यता में नहीं, सहमति में बदल चुकी है—जहाँ असहमत होना स्टेट-अपराध बन गया है।
लेकिन फिर भी, संकटपूर्ण अँधेरा पूरी तरह घना नहीं हुआ। अवामी लीग, स्मार्ट नागरिक समूह, साहित्य-कलाकार—वे अब भी उस लोकतांत्रिक उजियारे की किरन धारण किए हैं, जो मिटायी नहीं जा सकती। यह किरन तभी बलवती होगी जब विचार-विमर्श खुलेगा, बहस शुरू होगी, और जनता की आवाज़ प्रेस और कला में बदल जाएगी।
अब वक्त है:
- धर्मनिरपेक्षता को राजनीतिक उद्देश्य से मानवीय मूल्य बनाने का।
- नए प्रतिरोधी मोर्चों को गठित करने का—विद्यार्थी, पत्रकारिता, कलाकार, लेखक, बुद्धिजीवी मिलकर।
- भारत और अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को सिर्फ सहानुभूति नहीं, सक्रिय संवाद बनाना होगा—क्योंकि पड़ोसी देश की भयावह ज़मीन पर हमारे अपने मूल्य जुड़े हैं।
यह कोई विदेशी हस्तक्षेप का समय नहीं है, बल्कि मानवीय चेतना का—जो कि निरंकुश धार्मिक सत्ता से ऊपर अपना अस्तित्व बचाना चाहती है। धर्म की राजनीति ने बांग्लादेश को कहीं न कहीं आत्म-परिवर्तन के गले में घूंसे की तरह जकड़ा हुआ है। मर्यादा, संयम और विचार की स्वतंत्रता ही उसका बल्थनमार्ग बचा सकते हैं।
समय कम है, लेकिन उम्मीद अभी बाकी है—वह उम्मीद जो असहज सवाल पूछने में, गलतियों को स्वीकारने में, और विभिन्न आवाज़ों को समेटने में निहित है। बांग्लादेश को फिर उस धर्मनिरपेक्ष पहचान से मिल देने का समय आया है जो कभी उसका सबसे बड़ा गर्व था।
Author: This news is edited by: Abhishek Verma, (Editor, CANON TIMES)
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