भारत के दूरस्थ आदिवासी इलाक़ों में विकास की कहानियां अक्सर अधूरी रह जाती थीं। कहीं टूटी पगडंडियां, कहीं पानी के लिए मीलों पैदल सफ़र, तो कहीं अंधेरे में डूबे गांव—यह तस्वीरें आज़ादी के 75 साल बाद भी बदली नहीं थीं। लेकिन प्रधानमंत्री जनमन योजना इस परंपरागत उदास तस्वीर को रंगीन बनाने की कोशिश है।
राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने इसे आदिवासी कल्याण के क्षेत्र में स्वतंत्रता के बाद का सबसे बड़ा कदम कहा है। यह योजना केवल सुविधाएं देने का वादा नहीं करती, बल्कि आदिवासी समाज को देश की मुख्यधारा के विकास चक्र में बराबरी की सीट देने की पहल है।
योजना के मूल स्तंभ
- हर घर में नल का पानी और स्थायी बिजली
- पक्की और हर मौसम में चलने लायक सड़कें
- मज़बूत स्वास्थ्य ढांचा और मोबाइल मेडिकल वैन
- आधुनिक शिक्षा व्यवस्था और आंगनबाड़ी केंद्र
- मोबाइल और इंटरनेट कनेक्टिविटी
गुणवत्ता पर सख़्त नज़र
इस बार सरकार ने साफ़ किया है कि गिनती से ज़्यादा अहमियत गुणवत्ता को दी जाएगी। गांव-गांव तक निगरानी तंत्र बनाया गया है। हर तीन महीने में तहसील स्तर के अधिकारी मौके पर जाकर काम की प्रगति देखेंगे। मकान स्थानीय मौसम और संस्कृति के हिसाब से बनाए जाएंगे ताकि वे टिकाऊ और समुदाय के अनुकूल हों।
स्वास्थ्य में सांस्कृतिक संवेदनशीलता
आदिवासी भाषा और परंपराओं को समझने वाले स्वास्थ्यकर्मी मोबाइल मेडिकल यूनिट्स के साथ तैनात होंगे। यह कदम इलाज और भरोसे के बीच की खाई को पाटेगा। साथ ही, आंगनबाड़ी केंद्र सिर्फ़ भवन नहीं बल्कि बच्चों के पहले सीखने के केंद्र होंगे—इसलिए निर्माण की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होगा।
स्थानीय नेतृत्व की नई फौज
‘आदि कर्मयोगी अभियान’ के तहत तीन लाख युवाओं को प्रशिक्षित किया जाएगा, जो अपने गांव में विकास कार्यों के मार्गदर्शक बनेंगे। यह नेतृत्व न केवल योजनाओं को सही दिशा देगा, बल्कि प्रशासन और लोगों के बीच पुल का काम करेगा।
साझा मिशन, अलग नहीं
पुराने अनुभव बताते हैं कि विकास योजनाएं अक्सर अलग-अलग विभागों की खींचतान में धीमी हो जाती हैं। जनमन योजना में स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पेयजल, महिला एवं बाल विकास—सभी विभाग एक संयुक्त मिशन के रूप में काम करेंगे।
समयसीमा की गंभीरता
राज्यपाल ने तीन महीने में लक्ष्यों को हासिल करने का आह्वान किया है। जिन गांवों ने दशकों तक सड़क, पानी और बिजली का इंतज़ार किया है, उनके लिए यह समयसीमा सिर्फ़ आंकड़ा नहीं बल्कि जीवन बदलने की आख़िरी उम्मीद है।
अगर यह योजना सही नीयत, पारदर्शिता और तेज़ गति से लागू हुई, तो यह केवल एक सरकारी प्रोग्राम नहीं होगी, बल्कि यह भारत के आदिवासी समाज के साथ बराबरी और सम्मान का ऐतिहासिक समझौता बन जाएगी।
Author: This news is edited by: Abhishek Verma, (Editor, CANON TIMES)
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