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Tuesday, January 20, 2026, 10:23 am

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शुल्की आँधी और भारत–अमेरिका रिश्ते: भरोसे की नाव हिचकोले खाती हुई

शुल्की आँधी और भारत–अमेरिका रिश्ते: भरोसे की नाव हिचकोले खाती हुई
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भारत–अमेरिका संबंधों में कई बार उतार–चढ़ाव आए हैं, लेकिन राष्ट्रपति ट्रम्प की ताज़ा नीतिगत चोट ने जो झटका दिया है, उसने भरोसे की बुनियाद को गहराई से हिला दिया है। भारतीय सामानों पर अचानक आयात शुल्क को दोगुना कर देना, महज़ व्यापारिक चाल नहीं लगती—यह पुराने दौर के उस तनाव की गूँज है, जब 1971 में निक्सन और इंदिरा गांधी आमने–सामने खड़े थे। इतिहास, भले ही हूबहू न दोहराए, लेकिन उसकी छाया अक्सर पुराने घाव ताज़ा कर देती है।

इस नए फ़ैसले में अमेरिकी बाज़ार को जाने वाले भारतीय निर्यात के आधे हिस्से पर 50% शुल्क ठोंक दिया गया है। इसका असर यह है कि महीनों से चल रही व्यापार वार्ताएँ ठंडी पड़ गई हैं और कारोबारी माहौल अनिश्चितता के कोहरे में फँस गया है। भारत ने इसे “अनुचित” कहकर विरोध दर्ज कराया है, लेकिन ऐसे एकतरफ़ा कदमों के सामने केवल बयान देना नाकाफ़ी है। कारोबारी जगत अब तैयारी कर रहा है कि अमेरिकी बाज़ार में भारतीय उत्पाद महँगे होकर लगभग गायब हो सकते हैं, जबकि प्रतिस्पर्धी देशों को बिना मेहनत के मौक़ा मिल जाएगा।

CG

फिर भी, इतिहास गवाह है—संकट अक्सर रणनीतिक चतुराई का जन्मस्थान होता है। जैसे रूस–यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने सस्ते रूसी तेल को सुनहरा अवसर बना लिया। जामनगर की रिफ़ाइनरी इसका सबसे चमकदार उदाहरण है—जहाँ सस्ते कच्चे तेल को तैयार डीज़ल में बदलकर दुनिया भर को बेचा जा रहा है। पश्चिमी देशों के आरोपों में दोहरापन साफ़ झलकता है—वे भारत पर रूस को मज़बूत करने का दोष मढ़ते हैं, लेकिन ख़ुद परमाणु ऊर्जा और दूसरे क्षेत्रों में रूस से अपना मुनाफ़ा जारी रखते हैं।

ट्रम्प की नीति शैली—कभी अचानक मोड़, कभी तड़क–भड़क भरे बयान, तो कभी विरोधी सैन्य हलकों से मेलजोल—सिर्फ़ आर्थिक कारणों तक सीमित नहीं दिखती। अब भारत के सामने विकल्प है—या तो जवाबी वार करे और तनाव को बढ़ाए, या फिर लंबी रणनीति के तहत धैर्य रखे और बड़े लक्ष्य पर नज़र बनाए रखे।

ऊर्जा की वैश्विक राजनीति भी इस बहस के बीच एक अहम कारक है—यूरोपीय संघ का रूसी तेल से बने उत्पादों पर प्रतिबंध भारत के तेल संतुलन को बिगाड़ सकता है। अगर भारत जल्दबाज़ी में कदम उठाता है, तो इससे वही ताक़तें फ़ायदा उठाएँगी जो नई दिल्ली की मज़बूत होती साख को कमजोर करना चाहती हैं।

भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी ताक़त उसका संतुलित दृष्टिकोण है—जिसे कभी भी नर्मी या कमज़ोरी समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। ऐसे समय में संयम ही असली ताक़त है। आंधी और गरज को गुजर जाने दो; रास्ता उन्हीं के हाथ में होना चाहिए जो कूटनीति की बारीक़ियों को समझते हैं, न कि केवल शोर मचाने वालों के। राष्ट्रहित ही सबसे ऊपर है, और अपमान का ज़ख़्म वक़्त के साथ भर जाएगा। जब तूफ़ान थमेगा, तब भी भारत की नाव अपने रास्ते पर आगे बढ़ती रहेगी—और शायद और भी मज़बूत होकर।


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