Explore

Search

Tuesday, January 20, 2026, 2:45 pm

Tuesday, January 20, 2026, 2:45 pm

सत्ता की दीवारों पर न्याय की दस्तक

सत्ता की दीवारों पर न्याय की दस्तक
Share This Post

पुर्व सांसद और प्रभावशाली राजनीतिक परिवार के उत्तराधिकारी प्रज्वल रेवन्ना को उम्रकैद की सज़ा सुनाना भारत की न्याय प्रणाली के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ जैसा प्रतीत होता है। घरेलू सहायिकाओं के साथ बार-बार किए गए यौन शोषण जैसे जघन्य अपराध के लिए इतनी कठोर सज़ा, उस व्यवस्था में उम्मीद की किरण बनकर उभरी है जहाँ अक्सर प्रभावशाली लोगों को कानूनी जवाबदेही से ऊपर माना जाता रहा है।

यह फैसला केवल एक अभियुक्त को सजा देने का मामला नहीं है, बल्कि यह उस लंबे संघर्ष की परिणति है जो अक्सर कानूनी प्रक्रिया में शक्तिशाली आरोपियों द्वारा पेचीदा तकनीकी अड़चनों और राजनीतिक दबावों के सहारे धीमा कर दिया जाता है। परंतु इस मामले में न्यायालय ने जिस निर्भीकता से कार्य किया, वह प्रशंसनीय है। डीएनए साक्ष्य, दृश्य प्रमाण और घटनास्थल के वैज्ञानिक निरीक्षण के सहारे अभियोजन पक्ष ने जिस दृढ़ता से अपना पक्ष रखा, वह न्यायिक प्रक्रिया की संभावनाओं को पुनः परिभाषित करता है।

CG

रेवन्ना द्वारा अपने बीमार दादा और माता-पिता की देखभाल के नाम पर दया की याचना करना न केवल एक हास्यास्पद बहाना प्रतीत हुआ, बल्कि यह एक प्रकार से न्यायपालिका को भावनात्मक रूप से प्रभावित करने की चेष्टा थी। न्यायाधीश संतोष गजानन भाट द्वारा इस मुकदमे को “डेविड बनाम गोलियथ” की उपमा देना, इस बात का प्रतीक है कि अब अदालतें शक्तिशाली हस्तियों के विरुद्ध भी बिना भय के निर्णय लेने लगी हैं।

हालांकि इस निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिए, परंतु यह तथ्य भी परेशान करता है कि लगभग 70 संभावित पीड़िताओं में से बहुत कम ही न्याय तक पहुँच सकीं। राजनीतिक ताकत और सामाजिक डर के कारण कई पीड़ितों की आवाज़ दबा दी जाती है। यह स्थिति हमारे गवाह संरक्षण और पीड़िता सहायता तंत्र की गहरी विफलता को उजागर करती है।

बिलकिस बानो, आसाराम बापू और गुरमीत राम रहीम जैसे मामलों में जहाँ न्यायिक निर्णयों को समयपूर्व रिहाई और पैरोल जैसे निर्णयों से कमजोर किया गया, वहाँ प्रज्वल रेवन्ना का फैसला एक नये न्यायिक युग की आहट है। सर्वोच्च न्यायालय का यह दोहराना कि “न्याय को व्यावसायिक जोड़तोड़ से अपवित्र नहीं किया जा सकता”, आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक हो गया है।

अब असली परीक्षा यह है कि क्या यह फैसला अपीलों और राजनीतिक दबावों की भूलभुलैया में भी अडिग रह पाएगा। न्याय का असली अर्थ केवल दोष सिद्धि में नहीं, बल्कि उस निर्णय को टिकाए रखने की संस्थागत इच्छाशक्ति में निहित है।

यदि यह निर्णय आगे भी कायम रहता है और अन्य मामलों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत बनता है, तो यह न केवल न्यायिक जीत होगी, बल्कि सत्ता और जवाबदेही के संबंधों में एक नया संतुलन स्थापित करेगा — जहाँ कोई भी व्यक्ति, चाहे जितना भी ऊँचे ओहदे पर क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं माना जाएगा।

 


Share This Post

Leave a Comment