भारत द्वारा चीनी नागरिकों के लिए पर्यटक वीज़ा सेवा बहाल करने का निर्णय न केवल एक प्रशासनिक घोषणा है, बल्कि यह हिमालय के उस ठिठुरे संवाद में एक नई गर्माहट का संकेत भी है, जो वर्षों से गलवान की घाटी में जमी हुई है। यह पहल एक ऐसे दौर में आई है जब दोनों देश न केवल भौगोलिक रूप से, बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से भी दूर हो चुके थे।
बदले दौर में पुरानी दीवारें
2020 के गलवान संघर्ष ने भारत-चीन संबंधों को दशकों पीछे धकेल दिया था। सीमा पर सैनिकों के बलिदान ने केवल सीमाओं पर तनाव नहीं बढ़ाया, बल्कि आम भारतीय नागरिक के मन में भी गहरा अविश्वास बो दिया। उसी समय, कोविड-19 महामारी की उत्पत्ति और चीन की गोपनीय रणनीतियों ने द्विपक्षीय संवाद को लगभग शून्य पर ला दिया था।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हम स्थायी रूप से रिश्तों को उसी तनावपूर्ण चक्रव्यूह में घुमाए रख सकते हैं? या फिर हम यह मानें कि सैन्य मोर्चों पर अडिग रहते हुए भी, सांस्कृतिक और नागरिक स्तर पर संवाद की खिड़की खुली रहनी चाहिए?
संपर्क में समाधान की संभावना
ऐसे समय में जब दोनों देश वैश्विक मंचों पर आर्थिक नेतृत्व का दावा कर रहे हैं, तब आपसी दूरी केवल एक खोया हुआ अवसर बनकर रह जाती है। पर्यटन, शिक्षा, फिल्म, व्यापार और साहित्य — ये वे क्षेत्र हैं, जहाँ सीमा की रेखाएं धुंधली हो जाती हैं और मानवीय रिश्ते उभरते हैं।
भारत में चीनी भाषा और संस्कृति के प्रति रुचि बढ़ रही है, और चीन में भारतीय योग, आयुर्वेद और बॉलीवुड का आकर्षण व्यापक है। ऐसे में पर्यटन वीज़ा का पुनः प्रारंभ होना केवल यात्राओं की शुरुआत नहीं, बल्कि रिश्तों की बहाली का सांकेतिक कदम है।
कठिन मुद्दों पर कठोर लेकिन संवादपूर्ण रुख़ जरूरी
ब्रह्मपुत्र पर बाँध निर्माण हो, अरुणाचल प्रदेश पर दावा, या नक्शों में की गई उकसावे की हरकतें — ये मुद्दे भारत के लिए केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और रणनीतिक भी हैं। भारत को इन मोर्चों पर पूरी सख़्ती और स्पष्टता से बात रखनी चाहिए — लेकिन साथ ही जहाँ खिड़की खुली हो, वहाँ दीवारें खड़ी करने से परहेज़ भी जरूरी है।
नई शुरुआत का मूल्यांकन सतर्कता से करें
यह जरूरी है कि इस thaw को केवल प्रतीकात्मक सफलता न माना जाए। भारत को यह समझना होगा कि यह एक रणनीतिक संतुलन का खेल है, जिसमें भरोसा धीरे-धीरे कमाया जाता है, और किसी भी क्षण बिगाड़ा भी जा सकता है। वीज़ा बहाली को एकतरफा रियायत नहीं, बल्कि एक “परीक्षण की शुरुआत” के रूप में देखा जाना चाहिए — जिसमें अगले कदम चीन के रवैये पर निर्भर करेंगे।
निष्कर्ष:
कभी-कभी, सबसे ठंडी घाटियों में भी वसंत की आहट सबसे पहले सुनाई देती है। भारत-चीन के संबंध ऐसे ही एक कठिन भू-राजनीतिक क्षेत्र में खड़े हैं, जहाँ शब्दों की गर्माहट और सोच की नरमी से जमी हुई बर्फ़ पिघल सकती है — बशर्ते दोनों पक्ष भरोसे के बीज बोने को तैयार हों।
Author: This news is edited by: Abhishek Verma, (Editor, CANON TIMES)
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