“फटी खिड़कियाँ”—यह कोई वास्तुकला की खराबी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की वह दार्शनिक भाषा है, जिसे हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने हाल ही में IIT मद्रास में संबोधित किया। इस भाषण में उन्होंने विज्ञान, युद्ध और मीडिया—तीनों को एक ऐसे क्वांटम सिद्धांत में पिरो दिया, जिसे समझने के लिए शायद हाइजेनबर्ग को फिर से बुलाना पड़े।
🧠 कम बोलना, गहरी बात करना
डोभाल साहब आमतौर पर चुप रहते हैं। उनकी चुप्पी में रहस्य है, रणनीति है। लेकिन जब बोलते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे किसी गुप्त मिशन के संदेश को कोड में पढ़ा जा रहा हो।
IIT मद्रास में उन्होंने खुद कहा, “मैं सार्वजनिक मंचों पर आता नहीं… डॉ. गोयनका बोले, ‘पिछले सात साल में पहली बार देख रहा हूँ आपको किसी मंच पर।’ मैं भी सोचने लगा, हाँ, शायद…”
यह भूमिका दर्शाती है कि मंच असाधारण था, और जो बात आगे आने वाली थी, वह ‘फटाक से फटने वाला बम’ थी।
🎯 ऑपरेशन सिंदूर और नैनो-सटीकता
इसके बाद डोभाल साहब ने जो कहा, वह न भूतो न भविष्यति था:
“हमने पाकिस्तान में नौ आतंकवादी टारगेट तय किए थे, और एक भी चूके नहीं।”
“हमने कहीं और नहीं मारा। बस वहीं मारा जहां पता था कौन है।”
“…कहीं एक कांच की खिड़की तक नहीं टूटी।”
यह “फटी खिड़की का ना होना” न केवल शून्य हानि सिद्धांत को दर्शाता है, बल्कि भारत की सैन्य दक्षता को सापेक्षता के सिद्धांत से भी ऊपर ले जाता है।
📸 मीडिया, उपग्रह और चमत्कार
NSA ने सवाल उठाया:
“अगर पाकिस्तान ने कोई नुकसान किया, तो एक भी फोटो दिखाओ, एक भी खिड़की टूटी हो तो?”
और उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स, विदेशी मीडिया और सैटेलाइट इमेजरी की ओर इशारा करते हुए पूछा —
“कोई सबूत? नहीं है। क्योंकि खिड़की टूटी ही नहीं।”
यह बयान इतिहास, भौतिकी और सामरिक सोच—तीनों को झकझोर देता है।
🧪 IIT, गोमूत्र और नोबेल की प्रतीक्षा
जहाँ ये भाषण हो रहा था, वहीं पास में बैठे थे IIT मद्रास के निदेशक डॉ. कामाकोती, जिन्होंने हाल ही में गाय के मूत्र में मौजूद पेप्टाइड्स को एंटी-बैक्टीरियल करार दिया। उनकी वैज्ञानिक सोच इतनी गहन है कि उन्हें डोनाल्ड ट्रंप के नोबेल नॉमिनेशन के साथ रखा जा सकता है।
हालाँकि आलोचकों ने पूछा, “तो क्या गधे के मूत्र में भी वही गुण नहीं होते?” पर हमने उन्हें इग्नोर कर दिया। वैज्ञानिक प्रगति का मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए, खासकर जब वो हमारी “आत्मनिर्भर” सोच से जुड़ी हो।
🕵️♂️ ‘फटी खिड़की’ की काव्यात्मकता और क्वांटम सिद्धांत
“फटी खिड़की” का संदर्भ शायद सामरिक सफलता की परिभाषा बन चुका है।
जब पाकिस्तान के जवाबी हमले में एक भी कांच नहीं टूटा, तो यह भारत की विजयगाथा बन गई।
हालाँकि, इस व्याख्या में कुछ गड़बड़ी भी है—कुछ रक्षा अधिकारी कहते हैं कि “हमारे कुछ विमान क्षतिग्रस्त हुए”, लेकिन NSA साहब के अनुसार, ऐसा कुछ नहीं हुआ। अब सवाल ये है कि किसकी बात मानी जाए?
इस काव्यात्मक विमर्श में एक बात स्पष्ट है—कांच का ना टूटना ही हमारी जीत का प्रमाण है।
🧠 सारांश: तत्वमीमांसा बनाम तथ्यों का युद्ध
जहाँ एक ओर NSA का भाषण दार्शनिक और रहस्यात्मक प्रतीत होता है, वहीं यह भी दर्शाता है कि राज्य की ताकत अब केवल हथियारों में नहीं, भाषा की रणनीति में भी है।
- कोई खिड़की नहीं टूटी, इसका अर्थ है: हम अपराजेय हैं।
- कोई सबूत नहीं मिला, इसका अर्थ है: हम अदृश्य मारते हैं।
- और अगर कुछ हुआ भी हो, तो वो हुआ ही नहीं—क्योंकि डोभाल साहब ने नहीं कहा।
🇮🇳 तो क्या अब हम शांति नोबेल के हकदार हैं?
अगर ट्रम्प को शांति का नोबेल मिल सकता है, तो शायद ऑपरेशन सिंदूर और “फटी खिड़कियाँ” पर आधारित हमारी रणनीति भी नोबेल समिति को प्रेरित कर सकती है। या शायद हमें इज़रायली मॉडल अपनाना चाहिए—जहाँ बयानबाज़ी नहीं, केवल परिणाम दिए जाते हैं।
🔚 अंत में एक प्रश्न
क्या विज्ञान, सुरक्षा, राजनीति और काव्य एक ही वाक्य में समाहित हो सकते हैं?
IIT मद्रास का वह भाषण कहता है—हाँ, बिल्कुल हो सकते हैं।
Author: This news is edited by: Abhishek Verma, (Editor, CANON TIMES)
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